
जिला प्रशासन ने साफ कर दिया है बच्चों की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं। जिलाधिकारी विशाख जी की अध्यक्षता में हुई जिला विद्यालय परिवहन सुरक्षा समिति की बैठक में खुलासा हुआ कि 138 ऐसे वाहन स्कूलों में चल रहे हैं जिनकी फिटनेस और परमिट समाप्त हो चुकी है। वहीं 91 वाहन आयु पूरी कर चुके हैं, लेकिन फिर भी संचालन में हैं।
डीएम ने स्पष्ट निर्देश दिया, ऐसे स्कूल संचालकों को नोटिस जारी कर एफआईआर दर्ज कराई जाए। अगर इसके बाद भी सुधार नहीं हुआ तो स्कूल की मान्यता तक रद्द की जा सकती है।
“बच्चों की सुरक्षा से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं”
एपीजे अब्दुल कलाम सभागार में आयोजित बैठक में डीएम ने सवाल उठाया- स्कूल खुलने से पहले फिटनेस और परमिट क्यों नहीं लिए गए? एक्सपायर हो चुके वाहन अब भी फ्लीट में क्यों हैं?
उन्होंने दो टूक कहा, “यदि अप्रशिक्षित चालक से दुर्घटना होती है तो पूरी जिम्मेदारी स्कूल प्रबंधन की होगी।”
732 चालकों में से 430 का सत्यापन
अधिकारियों ने जानकारी दी कि 732 स्कूल वाहन चालकों का लाइसेंस सत्यापन होना था, जिनमें से 430 की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। बाकी की जांच जारी है। डीएम ने आदेश दिया कि सभी स्कूल यह सुनिश्चित करें कि जिन वाहनों से बच्चे आते-जाते हैं, उनकी पूरी जानकारी डीआईओएस और एआरटीओ को दी जाए।
लखनऊ में ट्रैफिक जाम पर हाईकोर्ट सख्त
उधर, Allahabad High Court की लखनऊ पीठ में राजधानी के बड़े स्कूलों के बाहर लगने वाले जाम पर सुनवाई हुई। डीसीपी ट्रैफिक ने कोर्ट में प्रस्ताव रखा कि 1500 से अधिक विद्यार्थियों वाले स्कूलों में कम से कम 10 प्रशिक्षित ट्रैफिक मार्शलों की तैनाती की जाए। ये मार्शल स्कूल परिसर के अंदर और बाहर यातायात नियंत्रित करेंगे।
अदालत ने राज्य सरकार से पूछा, नए स्कूलों को अनुमति देते समय ट्रैफिक आकलन होता है या नहीं? विकास एजेंसियां यातायात दबाव को ध्यान में रख रही हैं या नहीं?

मामले की अगली सुनवाई 10 मार्च को तय की गई है।
छात्राओं की सुरक्षा पर भी चिंता
खंडपीठ ने बालिका स्कूलों के बाहर छात्राओं को परेशान किए जाने के मुद्दे पर भी चिंता जताई। यह जनहित याचिका वर्ष 2020 में गोमती रिवर बैंक के निवासियों द्वारा दाखिल की गई थी। कोर्ट पहले भी कई बार ट्रैफिक प्रबंधन को लेकर निर्देश दे चुका है।
सिस्टम के लिए चेतावनी या सुधार का मौका?
एक तरफ अनफिट स्कूल वाहन सड़कों पर दौड़ रहे हैं, दूसरी ओर स्कूल टाइम में जाम से शहर जूझ रहा है।
सवाल यही है, क्या बच्चों को स्कूल भेजना अब ट्रैफिक और ट्रांसपोर्ट रिस्क मैनेजमेंट का हिस्सा बन गया है? अगर नियम हैं तो पालन भी होना चाहिए, वरना “सेफ्टी फर्स्ट” सिर्फ स्लोगन बनकर रह जाएगा।
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